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UNDERSTANDING SANATAN DHARM

the path towards superior intelligence

This is a frank discussion which has been initiated with the Indian community especially. The subject matter of this discussion is 

Are we truly Indians or Bhartiya according to our culture and heritage?

Let us see what we Indians have become today. 

यह स्तम्भ एक स्पष्ट चर्चा है जो कि विशेषकर भारतीय समाज के लिये प्रारम्भ की गयी है। इस चर्चा का शीर्शक है

हमारी संस्कृति व पैतृक सम्पदा के आधार पर क्या हम वास्तविक रूप से भारतीय हैं ? 

हम अब देखते हैं कि हम भारतीय वर्तमान समय मा वास्तव मे क्या बन चुके हैं।

Today we Indians, including both younger and older generations, have completely lost any interest in our own culture and heritage and are blindly moving towards the western culture without fully understanding even the western culture. So while on the one hand all the important aspects of our own culture and heritage are being discarded or brushed aside, on the other hand those aspects of the western culture are being accepted and practiced which look and sound fancy or are pleasure driven. So many aspects of the western culture which make them a civilized and disciplined society, Indians even do not bother to make an effort to find out. 

वर्तमान समय मे हम भारतीय अपनी भारतीय अस्मिता, संस्कृति व पैतृक सम्पदा मे विश्वास व रुचि खो चुके हैं व एक अंधे की भांति पाश्चात्य सभ्यता की ओर दौड़ रहे हैं, वह भी उस सभ्यता को पूर्णतया समझे बिना। जब कि हम अपनी संस्कृति की विशेषतायें व महत्व को त्याग चुके हैं व भुला चुके हैं, हमने उन पाश्चात्य रीतियों को अपना लिया है जो कि देखने व सुन ने मे सुन्दर हैं अथवा जो शारीरिक रूप से सुखदाई हैं। पाश्चात्य सभ्यता के वे गुण जो कि उन्हे एक सभ्य व अनुशासित समाज बनाते हैं, उन का हम भारतीयों ने न कभी खोजने का प्रयास किया है अपनाना तो दूर की बात है।

The result is very aptly described by an ancient Indian proverb "Dhobi ka Kutta na ghar ka na ghat ka". This may sound very harsh but then this is the reality and reality is harsher than fiction.

इस का परिणाम एक भारतीय लोकोक्ति द्वारा बहुत ही सुन्दर रूप मे दर्शाया जा सकता है , वह है " धोबी का कुत्ता, न घर का न घाट का "। यह वाक्य अवश्य ही चुभने वाला है परन्तु वास्तविक सत्य है व सत्य कटु ही होता है।

The result is what India as a society has become today and described as below.

परिणाम स्वरूप वर्तमान मे भारतीय समाज जो  व्यापक रूप से बन चुका है वह कुछ इस प्रकार है।

Starting with the governance

शासन तंत्र से आरम्भ करें तो

1. India has developed a system of governance which is corrupt to the core. So while the Indians have adopted the British democratic model of constitution they have not adopted the honesty and truthfulness practiced in the western culture, they have not adopted the culture of going to religious place on a regular basis and listening to religious discourse regularly, which the people living in western countries do. On the other hand Indians have also discarded their own heritage. 

भारत मे जो प्रजातंत्र व शासकीय तंत्र विकसित हो चुका है वह पूर्णतया व मूलतः भ्रष्ट है। अतः जब कि भारत का संविधान अंग्रेज़ी देशों से लिया गया, पाश्चात्य देशों मे जो मूलभूत ईमानदारी व सत्य के प्रति निष्ठा इत्यादि है, उन आचरणों को नहीं अपनाया गया। धार्मिक संस्थानो, मन्दिरों इत्यादि मे जाने की तथा धार्मिक प्रवचनो को नित्य सुनने की संस्कृति नहीं विकसित की गई जो कि पाश्चात्य सभ्यता के मूल अंग हैं। इस के विपरीत अपनी सभ्यता व संस्कृति का भी भारतीयों ने तिरस्कार कर दिया है।

For the information of readers Sanatan Dharma prescribes very high levels of personal character to be successful in life and profession. A strong character is also a prerequisite for acceptance of prayers. Without a strong positive character all the prayers to Gods are also as useless as crying in a jungle. Another important principle in Sanatan Dharma that any sinful act done such as making money by unfair means or killing an animal etc. leads to Pitr Dosh. Because of this Pitr Dosh the children and grand children of the person suffer no end. While the person may argue that he is adopting unfair means only for the benefit of his children, the reality according to ancient Indian scriptures is that by doing so he is doing the greatest harm to his progeny. Pitr Dosh is the negative result of misdeeds done by a person upon his progeny.

पाठकों की जानकारी हेतु मैं बताना चाहुंगा कि प्राचीन भारत मे सनातन धर्म मे जीवन मे सफल होने के लिये ईमानदारी व सत्य के प्रति निष्ठा आचरण के महत्वपूर्ण अंग माने जाते थे। सनातन धर्म मे प्रार्थनाओं की सफलता हेतु भी शिष्य का आचरण एक अति महत्वपूर्ण अंग है। बिना शुद्ध व शक्तिशाली सात्विक आचरण के प्रार्थनायें भी वैसे ही निर्रथक होती हैं जैसे जंगल मे जा कर रोना। वर्तमान भारतीय समाज मे किसी भी आचरण द्वारा धनोपार्जन समाज का एक नियम बन चुका है। इस प्रकार के आचरण भारतीय सनातन धर्म के सिद्धांतानुसार पितृ दोश मे परिणामित होते हैं। इस पितृ दोष के कारण व्यक्ति की संततियों को जीवन मे अनेक कष्टों का सामना करना पड़ता है। जब कि एक व्यक्ति यह तर्क दे सकता है कि वह यह सब सन्तानो के लिये ही कर रहा है, परन्तु सनातन धर्म के सिद्धांतानुसार इस प्रकार के भ्रष्ट आचरण द्वारा वह अपनी संतति को विशाल हानि पहुंचा रहा है। 

2. A large section of business men in India have adopted the culture of generating wealth by just any means. "Whatever might be the medium whether fair or unfair the wealth must be generated", this has become the moto of this section of people. Again the argument that unfair methods of generating wealth are futile and not fruitful in the long run stands and the results are that their children and grand children suffer due to Pitr Dosh. Pitr Dosh occurs even for smaller sins such as killing an animal.

भारत मे एक विशाल व्यावसायिक समुदाय ने धनोपार्जन हेतु ऐसी संस्कृति विकसित होने लगी है जिस मे वे धनोपार्जन हेतु किसी भी छोर तक जा सकते हैं। " चाहे जो कुछ भी माध्यम हो धनोपार्जन होना चाहिये " यह उन का लक्ष्य बन चुका है। यहां दोबारा यह समझना आवश्यक है कि किसी भी  पाप कर्म अथवा अनुचित माध्यम द्वारा धनोपार्जन द्वारा वे अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिये समस्याओं का ही सुनिश्चित कर रहे हैं। इन कृत्यों के दीर्घ कालीन परिणाम अच्छे नहीं हो सकते व इन व्यक्तियों की संततियां अवश्य ही पितृ दोष द्वारा समस्याओं द्वारा घिरी रहेंगी। पितृ दोष पाप कर्मो द्वारा उत्पन्न हो जाता है जिस मे कि एक कृत्य पशु हत्या भी है।

3. Telling lies and hiding of truth has also become a habitual culture of a huge number of Indians. A person who can tell a lie without blinking an eye is considered smart. A follower of truth is considered a fool. Telling lies in today's working environment has become a way of life with Indians. Mind it there is no freedom of speech or preaching involved here. The truth is truth and there is no point running away from the reality of life and telling lies actually makes a person's life miserable.

झूठ बोलना व सच को छिपाना भी हमारे समाज मे एक व्यावहारिक संस्कृति बन चुका है। एक व्यक्ति जो कि बिना पलक झपके झूठ बोलता है उसे समाज चतुर समझता है। व्यक्ति जो सच के प्रति निष्ठा रखता है उसे बेवकूफ समझा जाता है। व्यावसायिक परिवेष मे झूठ बोलना एक सामान्य जीवन का आधार बन चुका है। इस मे कोई बोलने की स्वतंत्रता तथा व उपदेश भी नही है । सच्चाई सच्चाई ही है व वास्तविक जीवन मे सच्चाई से भागने मे कोई वीरता नहीं है।

While the Indian culture and heritage attaches immense importance to sticking to the truth. Sticking to truth is considered equivalent to God in Sanatan Dharma. In fact sticking to truth in just any situation induces unimaginable powers in an individual. This is logical and can also be proved scientifically.

जब कि भारतीय संस्कृति व सभ्यता तथा सनातन धर्म के सिद्धांत सच के प्रति निष्ठा को भगवान के साक्षात्कार तुल्य ही बताते हैं। वास्तव मे सच के प्रति निष्ठा व्यक्ति मे असीम शक्तियों का उपार्जन करती है। यह तर्क संगत भी है व विज्ञान द्वारा परिमाणित भी किया जा सकता है।

4. We hold cow in very high esteem and a large section of Indians would go to any extent in upholding this high esteem and protecting a cow. But can any one tell me why cow is held in such high esteem in Indian tradition? I do not think any one can give answer to this except that so many of cow based products have medicinal value. But the real reason why we should hold cow in high esteem possibly no one knows and no one has tried to find out.

भारतीय समाज मे गौ को एक उच्च स्थान प्रदान किया गया है व अधिकांश भारतीय गौ के संरक्षण हेतु किसी भी परिमाण तक जा सकते हैं। परन्तु भारत मे वास्तविक गौ की दशा दयनीय ही है। क्या कोई बता सकता है कि भारतीय संस्कृति मे गौ को इतना उच्च स्थान क्यों प्राप्त है ? अधिकांश व्यक्ति यही उत्तर देंगे कि गौ द्वारा अनेकों औषधिय उत्पाद उपलब्ध किये जा सकते हैं। परन्तु क्या यही कारण है गौ को इतना उच्च स्थान देने का ? यह वास्तव मे संभवता कोई भी नही जानता न किसी ने जानने का प्रयास किया है।

5. Women and female children are openly disrespected and are abused. This abuse of women is rampant. This is again because we as Indians are not aware of our own heritage and culture and not aware of importance of women in human life. 

भारत मे जितनी दुर्दशा स्त्रियों व बच्चों की है कदाचित ही किसी देश मे हो। स्त्रियों का शोषण व्यापक है। इस का कारण यही है कि हम भारतीय अपनी संस्कृति तथा सभ्यता से अनभिज्ञ हैं व मानव जीवन मे स्त्रि के महत्व से अनभिज्ञ हैं।

6. Another influence of the western civilization is that we have stopped believing in God, or a doubt has been created in our minds about the existence of Gods. This is primarily because of Darwin's theory of evolution. But we have never tried to find out whether the Darwin's theory is correct or not. Modern scientific discoveries have already proven that Darwin's theory of evolution is no longer valid and scientific research is moving towards discovering existence of God. This is evident from "God particles" as suggested by modern scientific research.

पाश्चात्या सभ्यता का एक अन्य प्रभाव यह हुआ है कि हमने बिना सोचे समझे भगवान पर विश्वास करना छोड़ दिया है, अथवा भगवान के आस्तित्व पर हमारे मन मे एक संदेह उत्पन्न कर दिया गया है। इस का मूल कारण डार्विन का इवोलुशन का सिद्धांत है। परन्तु हम भारतीयों ने कभी यह खोजने का प्रयास नहीं किया कि क्या डार्विन का सिद्धांत वास्तविक सत्य है अथवा नहीं। आधुनिक वैज्ञानिक खोजों ने यह सिद्ध कर दिया है कि डार्विन का सिद्धांत वर्तमान मे अमान्य हो चुका है। आधुनिक वैज्ञानिक शोधअब भगवान के आस्तित्व की ओर झुकने लगा है। वैज्ञानिकों का "गौड पार्टिकल " का अनुमान लगाना इस दिशा मे एक साक्षात प्रमाण है।

Because of all the above and many more reasons we have stopped taking pride in our own tradition, culture, heritage and religion.

उपलिखित कारण तथा इसी प्रकार के अनेकों अन्य कारणो के कारण हम भारतीयों ने अपनी संस्कृति, सभ्यता तथा धर्म मे रुचि लेना व गर्व करना छोड़ दिया है।

Is our culture and heritage only limited to applying and throwing colors on holi, going to temples on certain festivals, bursting crackers on dipawali, going on holidays in the name of pilgrimage, putting a rakhi on your wrist on the occasion of rakhi, hurrying through reading a few mantras on marriages, taking a dip in holy rivers ? Is this all that we as Indians can call our heritage and culture? Rest of the time we are thieving taxes, thieving public money, raping women, running after money from morning till night and so on and so forth. Is this not our responsibility that we stop for a moment and think in which direction we are moving?

क्या हमारी सभ्यता व संस्कृति केवल इसी तक ही सीमित है कि हम होली पर रंग लगा लें, कुछ एक त्योहारों पर मन्दिर चले जायें, दीपावली पर पटाखे जलायें, छुट्टियां मनाने हेतु तीर्थ स्थानो पर जायें, राखी पर्व पर बहनो से राखी बंधवा लें, विवाह इत्यादि पर जल्दबाज़ी मे श्लोक पढ़े जायें, गंगा  इत्यादि नदियों मे डुबकी लगा लें ? इत्यादि। क्या हमारी संस्कृति व सभ्यता इन आचरणो तक ही सीमित हो कर रह गई है ? बाकि बचे समय मे हम करों की चोरी मे जुटे हैं, सरकारी कर्मचारी राजस्व चुराने मे व्यस्त हैं, अन्य व्यक्ति स्त्रियों से बलात्कार करने मे समय काट रहे हैं, समस्त जन प्रातः से सांयकाल तक धन के पीछे भाग रहे हैं इत्यादि। क्या यह हमारा उत्तरदायित्व नहीं है कि हम रुकें तथा सोचें कि हम किस दिशा मे भाग रहे हैं ?

Especially for my Indian friends I would like to tell them that we are unknowingly sitting on a vast treasure trove that ancient Indian knowledge is. This in reality is a huge treasure about which we do not even have an inkling. I would like to tell my Indian friends especially that this knowledge is such that with this knowledge we can generate immense amounts of wealth, immense powers etc. which can make us far more superior in terms of mental power or intelligence this knowledge can also make us physically immensely powerful. Out of ignorance we are discarding a powerful base of knowledge which is available to all of us just for asking and almost free. And there is nothing unscientific about this knowledge or its not a knowledge we should accept blindly. It is only that no one in the contemporary Indian society has made the efforts to study our vast scriptures and reach the crux of this knowledge.

विशेषकर मेरे भारतीय जिज्ञासुओं व मित्रों को बताना चाहुंगा कि अज्ञानवश हम भारतीय एक बहुत बड़ी निधि अथवा खजा़ने पर बैठे हैं जो कि प्राचीन भारतीय  ज्ञान रूप मे है। यह निधि कितनी विशाल है व कितनी शक्तिशाली है इस का हमे लेश मात्र आभास भी नहीं है।  यह ज्ञान इतना शक्तिशाली है कि इस के द्वारा न केवल धन सम्पदा उपार्जन कर सकते हैं,अपितु  इस ज्ञान से जीवन की अनेको अन्य समस्याओं का समाधान भी हो जाता है। यह हमारी समस्याओं के समाधान के अतिरिक्त हमारे विवेक का भी विकास करता है व हमारी बुद्धिमता को भी उत्तमता की ओर ले जाने मे सक्षम है। अज्ञानवश हम इस अपार ज्ञान सम्पदा का तिरस्कार कर रहे हैं जो कि हमें सहज ही प्राप्य है व वस्तुता निशुल्क है। यह ज्ञान पूर्णतया वैज्ञानिक व तार्किक आधार पर स्थित है व इस ज्ञान मे कोई अंधविश्वास भी नहीं है। हुआ केवल यह है कि समकालीन समाज मे स्वतंत्रता के पश्चात किसी ने भी हमारे प्राचीन ग्रंथो को पढ़ने व समझने का प्रयास नहीं किया है व इस ज्ञान के मूल तक जाने का प्रयास नहीं किया है।

The books "UNDERSTANDING SANATAN DHARMA " in English and " SANATAN DHARMA EK PUNAH VICHAR" in Hindi have been written specifically to give an insight into what exactly this knowledge is. As this knowledge base is very vast, for a beginner it would be difficult to understand where to start. The books have therefore been written to show a path and are a step by step guide to this vast reservoir of knowledge. The books in the process also give an introductory view inside the Indian thought and understanding of the philosophy. The books also introduce the forgotten practices of the Sanatan Dharma which can make a person highly intelligent and powerful both mentally and physically.

प्रकाशित पुस्तकें  "अंडरस्टैंडिंग सनातन धर्म " अंग्रेज़ी भाषा मे तथा "सनातन धर्म एक पुनः विचार " हिंदी भाषा मे इस ज्ञान के निरुपण हेतु ही लिखी गई हैं कि यह ज्ञान है क्या। क्युंकि यह ज्ञान कोश अति विशाल है, एक नये जिज्ञासु के लिये यह जानना कठिन है कि कहां से आरम्भ करें। इस कारण इन पुस्तकों मे एक मार्ग दर्शाने का प्रयास किया गया है। यह पुस्तकें इस विशाल ज्ञान भंडार की ओर एक क्रमबद्ध पथ प्रदर्शक है। इस क्रम मे यह पुस्तकें भारतीय विचार, संस्कृति व दर्शन का भी परिचय देती हैं। यह पुस्तकें सनातन धर्म की उन पद्धतियों का भी निरुपण करती हैं जिन्हे वर्तमान समय मे भुला दिया गया है। यह पद्धतियां जहां एक ओर मानव समस्याओं का समाधान करने मे सक्षम हैं वही दूसरी ओर मानव के विवेक व बुद्धिमता का विकास करती हैं। 

What we read in a cursory manner about the intelligence and physical prowess of our ancestors in the ancient times are not just stories. All those mental and physical powers can be attained even today.

 

जो प्राचीन भारत का इतिहास है जिसे हम कहानियां समझते हैं जिन मे हमारे पूर्वजो द्वारा प्राप्त की गई शक्तियों का विवरण है, वे केवल कहानियां नहीं हैं अपितु वास्तविक सत्य पर आधारित हैं। वे समस्त  मानसिक व शारीरिक शक्तियां वर्तमान मे भी प्राप्त की जा सकती हैं।

 

THIS IS AN IMMENSE AMOUNT OF KNOWLEDGE WHICH CANNOT BE DESCRIBED IN FEW WORDS OR SENTENCES. BUT TO MAKE A START IN THAT DIRECTION WE FIRST OF ALL NEED TO UNDERSTAND OUR ANCIENT INDIAN HERITAGE, THE SANATAN DHARMA.

 

इस विशाल ज्ञान  के भण्डार का विवरण कुछ शब्दों अथवा वाक्यों मे नहीं किया जा सकता। परन्तु इस दिशा मे आरम्भ करने हेतु प्रथम हमे प्राचीन भारतीय धर्म सनातन धर्म को जानना आवश्यक है। 

 

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